Wednesday, December 29, 2010

वीरांगना श्यामा बाई तंवर की समाधी

सन 1680-85 के दौरान दिल्ली के बादशाह ओरंगजेब मालवा से होते हुवे गुजरात जाते समय सांवेर नगर उस समय के सगाना में खान नदी के किनारे अपने लाव-लश्कर के साथ विश्राम किया । तब उन्होंने सांवेर के तात्कालिक जागीरदार को अपने आने का सन्देश भिजवाया । जागीरदार अपने सैनिको के साथ बादशाह की अगवानी के लिए तोहफे लेकर पहुंचे तथा बादशाह का इस्तकबाल कर अगवानी की । बादशाह द्वारा जागीरदार को उनकी बेटी (पुत्री) का निकाह उनके साथ करने को कहा तथा कुछ सैनिको के साथ डोला जागीरदार के बड़ा रावला महल में भेजा । जागीरदार श्री तंवर की मनोदशा बड़ी विचित्र थी की वे क्या करे एक तरफ उनकी लाडली बेटी श्यामा और दूसरी और बादशाह का आदेश, अगर आदेश का पालन नहीं करे तो उनकी रियाया (जनता) के साथ उक्त अत्याचारी बादशाह क्या जुल्म करेगा यह सोचकर जागीरदार परेशान थे । उनकी परेशानी की जानकारी उनकी पुत्री श्यामा को मिली तो उन्होंने अपने पिता की परेशानी को दूर करने के लिए बादशाह के भेजे डोले के साथ जाने की इच्छा जताई, पिता ने भारी मन से अपनी पुत्री का डोला बादशाह के पास रवाना किया । लेकिन श्यामा के मन में कुछ और था, वह डोले में बैठकर सैनिको के साथ बड़ा रावला से रवाना होकर बाज़ार चौक तक पहुची और उसने कटार अपने सिने में घोपकर अपनी जीवन लीला समाप्त करली । बेटी श्यामा ने अपने पिता का मान रखते हुवे तथा जनता की सुरक्षा का ध्यान रख कर अपना बलिदान दिया । इसकी सुचना बादशाह को दी गई तो बादशाह ने जागीरदार को श्यामा बाई का बाज़ार चौक में अंतिम संस्कार कर उनकी याद के लिए स्मारक बनाने का आदेश दिया । जागीरदार परिवार ने उनका अंतिम संस्कार बाज़ार चौंक में कर वही स्मारक बनायीं जो वीरांगना श्यामा बाई की याद दिलाती है, इस प्रकार वीरांगना श्यामा बाई ने अपना बलिदान देकर सांवेर (सगाना) की प्रजा की जान बचाई ।

कट्क्या नदी

सांवेर में कट्क्या नदी के तट पर इमली के पेड़ो के नीचे होल्कर घराने के हाथी-घोड़े बांधे जाते थे। इसको हाथी थान भी कहते है यंहा हाथियों को नहलाया जाता था। पूर्व में यंहा पनघट हुआ करता था , सारा सांवेर यंहा से पेयजल की व्यवस्था करता था । जब 1964 में अकाल पड़ा तब कट्क्या नदी के जल से आपूर्ति हुई थी।

खुरासानी इमलीयां

सांवेर क्षेत्र में खुरासानी इमली के पेड़ो की संख्या बहुत अधिक है, इन पेड़ो को जैन शास्त्रों में कल्पवृक्ष कहा गया है। सांवेर कोर्ट के पीछे परिसर में एक कल्पवृक्ष का पेड़ है जो 500 साल से अधिक पुराना है। यह पेड़ उन क्षेत्रो में देखने को मिलता है जंहा प्राचीन में किसी राजा-महाराजाओ का इतिहास रहा हो। इस पेड़ का तना 12 मीटर (36 फूट) से भी अधिक चौड़ा है, इसके तने में ऐसी सुन्दर नक्काशी देखने को मिलती है जैसे किसी कारीगर ने अपनों हाथो बनायीं हो।


सांवेर के भुट्टे

भुट्टे के बिना सांवेर का इतिहास अधुरा लगता है । क्या कहना यंहा के भुट्टे का , सांवेर बायपास रोड के दोनों किनारों पर लगी दुकाने , गरमा-गरम धधकते अंगारों पर पकते स्वादिष्ट भुट्टो का जायका लिए बिना यंहा से कोई नहीं गुजरता । संत, नेता, अभिनेता, अफसर, उद्योगपति, समाजसेवी, कावड़यात्री व् अन्य कोई भी व्यक्ति हो यंहा के भुट्टे का स्वाद लिए बिना आगे नहीं बढता । 365 दिन यंहा भुट्टे का मेला लगा रहता है । कई मुसाफिर तो यंहा तक कहते है कि आप सांवेर से गुजरे और भुट्टे नहीं खाए तो समझो आपकी यात्रा अधूरी है । कई श्रद्धालु तो यंहा से कच्चे भुट्टे लेकर जाते है, और महाकाल को चढाते है ।बारिश के मौसम में तो भुट्टो के दीवानों की यंहा भीड़ रहती है, कई लोग भींगते भी है साथ में भुट्टे का मजा भी लेना नहीं भूलते ।

बस मार्ग

सांवेर नगर माँ अहिल्याबाई होल्कर का प्राचीनतम नगर है, जो खान एवं कट्क्या नदी के किनारे पर बसा है। तीर्थनगर उज्जैन एवं औद्योगिक नगर इंदौर व् देवास के निकट में स्थित यह नगर जयपुर-कोटा मार्ग पर स्थित है। नगर में विभिन्न स्थानों को जाने के लिए लगभग 50 प्रायवेट बसे हर समय उपलब्ध रहती है। नगर से राज्य परिवहन निगम की बसे महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान के शहरो के लिए प्रतिदिन उपलब्ध रहती है । नगर से आगरा-बॉम्बे मेनरोड की दुरी 20 कि. मी. है, जंहा से बस मार्ग द्वारा कही भी पहुँचा जा सकता है।

रेल मार्ग

रेल मार्ग:- मीटर गेज :- चन्द्रावतीगंज व् अजनोद रेल्वे स्टेशन की दुरी यहाँ से लगभग 10 कि. मी. है। जहाँ से अजमेर हैदराबाद की ट्रेने सदा यात्रियों को उपलब्ध रहती है। ब्राड गेज :- सबसे निकटतम उज्जैन (22कि. मी) एवं इंदौर (30कि. मी) का रेलवे स्टेशन है जंहा यात्रियों को भारत के हर कोने में आवागमन हेतु सुलभ व्यवस्था उपलब्ध है।

एयरलाइंस

सांवेर से निकटतम एयरपोर्ट इंदौर 30 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। डोमेस्टिक एयरलाइंस जैसे इंडियन एयरलाइंस और निजी एयरलाइंस जैसे सहारा, जेट एयरवेज आदि जहा से दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और सभी प्रमुख शहरों के लिए विमान उपलब्ध मिलते है ।

काशी विश्वनाथ मंदिर धरमपुरी

सांवेर से 15 कि.मी. दूर इंदौर मार्ग पर धरमपुरी के निकट मंगल धार्मिक ट्रस्ट इंदौर के रमेश मंगल द्वारा 16 अप्रैल 2000 को निर्मित सुन्दर एवं विशाल मंदिर में भगवान काशी विश्वनाथ का आकर्षक शिवलिंग स्थापित किया गया। जिसके दर्शनार्थ बड़ी संख्या में श्रद्धालु आकर पुण्य अर्जित करते है। मंदिर के आचार्य पं. गोपाल शास्त्री के सानिध्य में प्रतिवर्ष श्रावण मास में विशेष धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होते है। समीप ही महामंडलेश्वर स्वामी बालकृष्ण यति जी कि प्रेरणा से भारतीय संस्कृति शिक्षण संस्थान स्थापित किया गया है। भगवान काशी विश्वनाथ मंदिर और समीप के मैदान पर यति जी महाराज की सद्प्रेरणा से इस क्षेत्र में सदी का विरला धार्मिक अनुष्ठान "कोटि रूद्र महायाग' निर्विघ्न सम्पन्न हुआ जिसकी लाखो जोड़ी आंखे साक्षी रही । इस महायाग के अनुष्ठान की सफलता और शुभ फल प्राप्ति के लिए महामंडलेश्वर वेदान्ताचार्य स्वामी बालकृष्ण यतिजी द्वारा शास्त्र के विशेष नियमो व् आज्ञा का पालन करवाया गया। यज्ञ के बारे में कहा जाता है कि यज्ञ से प्रकृति को उर्जा मिलती है। मानव शरीर पृथ्वी, जल, आग वायु, आकाश इन पंच तत्वों से मिलकर बना है। इस प्रकार हमारा शरीर संम्पूर्ण प्रकृति पर अधीन है। प्रकृति देव के अधीन है, देव मंत्रो के अधीन है और मन्त्र ब्राहमण अधीन है यही स्रष्टि क्रम है। शास्त्र विधि को छोड़कर कोई कार्य सिद्ध नहीं होता न सिद्धि प्राप्त होती है न सुख मिलता है और न ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।यज्ञ परमात्मा एवं प्रकृति की सेवा-आराधना का ही स्वरूप है। इस संपूर्ण अतिरुद्र कोटि महायज्ञ में आस्था हिलोरे ले रही थी। मंत्रोचार की ध्वनी और यज्ञशाला की धुन आत्मिक शांति प्रदान कर रही थी। मन ही मन ईश्वर का मनन हो रहा था। आस्था का एक ऐसा माहोल तैयार हो चूका था की हर व्यक्ति भक्ति में ही खोया नजर आ रहा था। यज्ञ में पड़ने वाली आहुतियो से आयोजन की खुशबु दूर-दूर तक पहुंची। देश भर से भक्त यंहा पहुंचे और कुछ विदेशी भी आत्मिक शांति पाते नजर आये।

"शिव और रुद्र ब्रह्म के ही पर्याय हैं। शिव ही वेद हैं और वेद ही शिव हैं। वेद को परमात्मा की श्वांस भी कहा गया है। रुद्र पाठ करते हुए ब्राह्मणों की परिक्रमा करना पृथ्वी की परिक्रमा के समकक्ष माना गया है। वेद मंत्रों द्वारा ईश्वर की पूजा-अभिषेक, यज्ञ और जप-तप के अनुष्ठान विज्ञान सम्मत हैं"

उक्त प्रेरक विचार
महामंडलेश्वर स्वामी बालकृष्णयतिजी ने कोटिरुद्र महायज्ञ में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में वेद की अनुपम महिमा है।

बनारस के यज्ञाचार्य पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित ने कहा कि "जो धन पुरुषार्थ से अर्जित होता है उसका कुछ अंश यदि यज्ञ, जप-तप आदि धार्मिक अनुष्ठानों में लगा दिया जाए तो वह धन धन्य हो जाता है। धनार्जन जीवन की अनिवार्यता है लेकिन उस धन का कुछ हिस्सा धर्म में लगाना भी शास्त्रों में पुण्य माना गया है। उन्होंने कहा कि मर्यादा के बदले अपयश तथा द्रव्य के बदले दरिद्रता और प्रसन्नता के बजाय अनिष्ट जैसे अकल्याणकारी परिणाम धर्म एवं संस्कृति से विमुखता के कारण ही मिलते हैं, अन्यथा भगवान शिव कभी किसी धर्मनिष्ठ का अकल्याण कर ही नहीं सकते। यज्ञ, दान, तप और जप जैसे अनुष्ठान भारतीय संस्कृति की विशिष्ट पहचान हैं"

"न भूतो न भविष्यति "
आचार्य पं. गोपाल शास्त्री के अनुसार "ये शास्त्रों के अनुरूप अनुष्ठान किया जा रहा है। अनुष्ठान भगवान शिव को समर्पित है। इस प्रकार का अनुष्ठान होना अविस्मरणीय है। शायद ही ऐसा अनुष्ठान भविष्य में सुनने को मिलेगा"

जुना पीठाधीश्वर आचार्य महा मंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरी जी अनुसार "ये रूद्रकोटि महायज्ञ का दुर्लभ अनुष्ठान शिवस्वरूप है। भगवान सत्पुरुषो के संकल्पों को पूरा करता है। ऐसे आयोजन से मैं अभिभूत हूँ। इससे धर्मं और संस्कृति मजबूत होगी और मानसिक विकृतिया भी दूर होगी"

इस महाआयोजन की विशेष रिपोर्ट पत्रकार राजेंद्र सोनी द्वारा दैनिक भास्कर में प्रकाशित की गई थी। प्रस्तुत है -

अतिरुद्र कोटि महायज्ञ , आयोजन स्थल धरमपुरी सांवेर , कुल एरिया 35 एकड़ जिसमे यज्ञशाला, प्रवचन पंडाल, भोजन शाला, संत निवास, ब्राह्मणों के लिए अलग से भोजन शाला, मेला, स्वास्थ सुविधा, वाहन पार्किंग, भंडार गृह, रसोई घर, पुलिस सहायता केंद्र आदि बनाये गए।

आयोजन :- 6 दिसंबर 2009 को अभिषेकात्मक रूद्रपाठ शुरू हुआ। 31 दिसंबर 2009 को रूद्रपाठ की पूर्णाहुति हुई। इसी दिन चन्द्र ग्रहण पर अनिष्ठ निवारण प्रयोग किया गया। 1 जनवरी 2010 को जल कलश शोभायात्रा निकाली गयी, इस दिन से महायज्ञ शुरू हुआ। रास लीला भी शुरू हुई। इसका समापन 10 जनवरी 2010 को हुआ। 9 जनवरी 2010 को रासलीला में श्रीकृष्ण -रुक्मणि विवाह का मंचन हुआ। 2 जनवरी 2010 से राजकोट की मीराबेन द्वारा श्रीमद भागवत कथा प्रस्तुत की गई जिसका समापन 8 जनवरी 2010 को हुआ। 9 और 10 जनवरी 2010 को कलाकार पंकज और पूजा द्वारा भरत नाट्यम, तांडव नृत्य प्रस्तुत किये गए।

यज्ञशाला पर एक नजर - कुल 25 कुंड जिनमे प्रतिदिन 25 यजमान ने गोग्रथ की आहुति तथा 100 यजमान सपत्निक शाकल्य की आहुति देते थे। 6 दिसंबर 2009 से महायाग शुरू हुआ जिसमें 31 दिसंबर 2009 तक अभिषेकात्मक अतिरूद्र महायज्ञ हुआ। यज्ञाचार्य पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित के मार्गदर्शन में 330 विद्वानों ने 31 दिसंबर 2010 तक 3 करोड़ रूद्र पाठ किये। 1 जनवरी से 10 जनवरी 2010 तक यज्ञशाला में आहुतियाँ दी गई। प्रतिदिन 190 विद्वानों द्वारा यज्ञ कराये गए। 11 पार्थिव शिवलिंग रोज बनाकर दुग्धाभिषेक किया गया। आचार्य गोपाल शास्त्री के मार्गदर्शन में 11 विद्वान् मंदिर में रूद्र पाठ कर काशी विश्वनाथ का दुग्धाभिषेक करते थे। मुख्य यज्ञाचार्य पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित और उनके सहायक 11 विद्वान् यज्ञ में सहयोग करते थे। इसके आलावा चार वेदों के विद्वान् , 18 पुराण और 4 सहपुरान के आलावा इक धर्मशास्त्र, दुर्गा सप्तशती, श्री गणेश अर्थवशीर्ष, श्रीराम रक्षा स्त्रोत, हनुमान चालीसा का भी पाठ हुआ। स्फटिक के शिवलिंग का भी प्रतिदिन अभिषेक होता था।

शामिल हुए महामंडलेश्वर :- सवा माह चले इस महायाग में 15 महामंडलेश्वर एवं संत शामिल हुए इसमें महामंडलेश्वर स्वामी अर्जुनपूरी जी महाराज ,महामंडलेश्वर स्वामी प्रकाशनन्द जी महाराज ,महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंदजी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी आत्मप्रकाशजी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी ज्योर्तिमयानंद जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी आनंद चैतन्य जी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी प्रेमानन्दजी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी प्रखरजी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदनजी महाराज, महामंडलेश्वर स्वामी परेशनंदनजी महाराज के अलावा स्वामी मोहनानंदजी महाराज, स्वामी चेतनदासजी महाराज, स्वामी अण्णा महाराज, पं. कमलकिशोरजी नागर आदि प्रमुख रूप से शामिल हुए थे।

11 जनवरी 2010 को सुबह अभिजित मुहूर्त में 11.45 से 12.15 के बिच पूर्णाहुति हुई इसके बाद महाआरती एवं भंडारा हुआ जिसमे डेढ़ लाख से अभी अधिक श्रद्धालु आये थे। मंदिर में बनने वाले संत निवास और प्रवचन पंडाल का भूमिपूजन हुआ। शाम पांच बजे से साढ़े सात बजे तक महामंडलेश्वर बालकृष्ण यतिजी का जन्मोत्सव मनाया गया। इसमें महामंडलेश्वरो और नारायण यज्ञ समिति के सदस्यों द्वारा पाद पूजन कर अभिनन्दन किया गया। 12 जनवरी 2010 को अविभ्रत प्रयोग ओंकारेश्वर में हुआ। इसमें वरिष्ठ यज्ञाचार्य पं. लक्ष्मीकांत दीक्षित के अलावा कई विद्वान् और यजमान भी शामिल हुए एवं माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना की।

नरसिंह मंदिर केशरीपुरा

इस मंदिर को "तपस्वी भूमि" के नाम से भी जाना जाता है। ये मंदिर कई तपस्वियों की तपो भूमि रह चूका है। बुज़ुर्ग लोगो का कथन है की प्राचीन समय में यंहा 4 संत "श्री १००८ रामचरण दास जी महाराज", "श्री अलख महाराज" व् "श्री खाकी बाबा" एवं "इक फकीर" हुआ करते थे जिनकी समाधी एवं मजार सांवेर व् केशरीपुरा में स्थित है। हिन्दू-मुस्लिम एकता का अनूठा संगम अगर प्राचीन काल में कही देखा जाये तो सांवेर से बढकर इसका उदाहरण कही नहीं मिल सकता है। इन संतो के बारे में कहा जाता है की इनकी आपस में ऐसी गहरी निष्ठा थी कि बारिश, आंधी, तूफान भी इन्हें रोक नहीं सकते थे , ये संध्याकाल में कैसी भी विकट स्थिति होती थी चारो आपस में मिलते जरुर थे ।

श्री १००८ श्री रामचरण दास जी तपस्वी

केशरीपुरा में कट्क्या नदी के किनारे नरसिंह मंदिर के संस्थापक स्वामी श्री १००८ श्री रामचरण दास जी तपस्वी एक महान संत एवं योगी थे, इनके संबंध में कहा जाता है कि जब इनके गुरु का देहावसान हुआ, तब इनके द्वारा किये गए भंडारे में शुद्ध घी के मालपुवे बनाये गए थे । तब घी की कमी के कारण इन्होने कट्क्या नदी में से पानी के डिब्बे भरकर उस पानी से मालपुवे तैयार कर उस भंडारे का आयोजन किया, तत्पश्चात शुद्ध घी के डिब्बे बुलवाकर नदी में विसर्जित किये । इनका मानना था की घी उधार लिया गया था, इसीलिए नदी में विसर्जित किया गया ।अब इस मंदिर का जीर्णो उद्धार करके भव्य नरसिंह मंदिर बनाया गया है ।

अलख महाराज

इन्ही के समकालीन श्री अलख महाराज नागा संप्रदाय से जुड़े हुए एक दिव्य योगी थे। इनके बारे में कहा जाता है कि ये प्रतिदिन एक घर पर भिक्षा के अलख निरंजन किया करते थे एवं दुसरें घर पर पानी के अलख जगाते थे। ये इनका नित्य कर्म था । कहते है कि ये एक बार भिक्षा वृति के लिए गए तब किसी ने इनको भिक्षा न देकर अपशब्द कहे, तब इन्हें संसार से विरक्ति हो गयी और इन्होने कट्क्या नदी के किनारे जीवित समाधी ले ली । जंहा अभी एक शंकर मंदिर स्थित है । समय-समय पर ये अपनों भक्तो को दर्शन भी देते है ,और उनकी मनोकामना पूर्ण करते है ।जिसके कई प्रमाण आज सांवेर में मौजूद है ।

खाकी महाराज (उल्टे हनुमान मंदिर)

उल्टे हनुमान मंदिर के महंत श्री १००८ खाकी महाराज जो कि सांवेर की दिव्य विभूति थे । इनके बारे में वर्तमान पुजारी द्वारा बताया गया कि ये एक महान योगी एवं विरक्त संत होते हुए कई दिव्य सिद्धियों के ज्ञाता थे । वे बताते है कि ये चारो संत किसी भी विकट परिस्थिति में आपस में मिलते थे, ज्ञान चर्चा करते थे, एवं महांकाल दर्शन के लिए जाते थे । वे अपनी खडाऊ पहनकर नदी पार कर लेते थे । इन्ही महंत की समाधी उल्टे हनुमान मंदिर में स्थित है और ये हनुमान जी के परम उपासक थे ।

फकीर

ये फकीर बाबा भी उपरोक्त संतो की तरह दिव्या शक्तियों के ज्ञाता थे । पानी पर चलना, पल भर में मिलो का सफ़र करना तय करना ये उनके लिए साधारण बात थी। इनकी मजार मानक चौक में खान नदी के किनारे पर बनी हुयी है ।